Pitru Paksha 2024: पूर्वजों की आत्मा की शांति के लिए यहां पिंडदान नहीं, `शिवलिंग` करते हैं दान

मठ के व्यवस्थापक स्वामी शिवानंद ने बताया कि जो शिवलिंग जीर्ण हो जाते हैं, उन्हें परिसर में स्थित कुओं में विसर्जित कर दिया जाता है।

मठ में प्रतिदिन लगभग हजारों दक्षिण भारतीय श्रद्धालुओं का आवागमन होता है। पांचवीं सदी से मिलता है इतिहास काशी के प्राचीनतम मठों में एक यह मठ ज्ञान सिंहासन अथवा ज्ञानपीठ रूप में जाना जाता है।

मान्यता है कि पांचवीं शताब्दी में श्रीकाशी विश्वनाथ ज्योतिर्लिंग से जगतगुरु विश्वाराध्य का उद्भव हुआ था।

1918 में जगदगुरु विश्वाराध्य गुरुकुल की स्थापना वीर शैव धर्म के पांच पीठों के आचार्यों की देख-रेख में हुई थी। वैसे मठानुयायी इसे तीन हजार वर्ष पुराना होने का दावा करते हैं लेकिन ऐतिहासिक साक्ष्य आठवीं शताब्दी तक के मिलते हैं।

मठ में कई गुरुमाएं भी रही हैं।

वीर शैव लोग केवल शिवलिंग की आराधना करते हैं।

यहां जाति भेद व पुनर्जन्म की मान्यता नहीं है।

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